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सुकून

  सुबह~सुबह पड़ोस की छोटी बच्ची मेरे पास आई और एक सवाल पूछा "क्या आसमान और सागर कभी मिलते है"? मैने मुस्कुराकर बेमन से कहा "नहीं"। आज तीन बरस हो गए है तुम्हे शहर गए और मैं आज भी यही पहाड़ों के बीच किताबे लिखता हूं । आज ही के दिन हम आखरी बार " सुकून " पर मिले थे ,तुमने उस पहाड़ी का नाम सुकून तब रखा था जब तुमने उस दिन अचानक से मेरे कंधे पर अपना सिर रख कहा था " इस पहाड़ी पर सब ठहर सा जाता है " और मैने कहा था " इस पहाड़ी पर सुकून है।" कई इमारतें बन ने के बाद भी "सुकून" मेरी खिड़की से आज भी दिखता है और जब भी कोई नई कहानी लिखता हूं तो "सुकून"मुझे तुम्हारी याद दिलाता है । हम जब भी "सुकून" पर मिलते तब अक्सर शाम का वक्त होता था । मै अपने घुटनों पे हाथ रख शरीर को टिकाए सामने के नदी को देखता था और तुम मेरे बगल में लेट आसमान के तारे देखती थी । मै पास की चीजों पर ध्यान लगाता और तुम दूर की चीजों पर नजर रखती। मै मेरी बाहों भर संसार में खुश था पर तुम्हे तो सारा ब्रह्माण्ड चाहिए था। मै खुश इसलिए था क्युकि मेरे संसार में...